सर सैयद दिवस

- सर सैयद के 209वीं जयंती पर बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश मसीह
- सर सैयद दिवस पर अपने पुरानी यादों को किया ताजा, बताया कैसे पहुंचे थे एएमयू
- दिल्ली में प्रवेश नहीं मिला तो चाचा ने एएमयू मिंटो सर्किल स्कूल में कराया नामांकन
- न्यायाधीश मसीह बोले सभी इच्छाएं पूरी हो जरूरी नहीं, पर सपने देखना न छोड़े
अलीगढ़। ख्वाहिशें करना गुनाह नहीं, सपने देखना न छोड़े…संघर्ष और दृढ़ संकल्प की तुलना आज के युवाओं को केवल सफलता हासिल करना ही नहीं, बल्कि असफलताओं का सामना करना भी सीखना चाहिए। यह बातें सर सैयद दिवस के 209वीं जयंती पर मुख्य अतिथि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने कही।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने अपने संस्थापक सर सैयद अहमद खान की 209वीं जयंती मनाई। गुलिस्ताने सैयद में आयोजित समारोह की अध्यक्षता एएमयू की कुलपति प्रो. नइमा खातून ने की। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह मुख्य अतिथि थे। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह और केरल के एझिमाला स्थित भारतीय नौसेना अकादमी के प्रिन्सिपल रियर एडमिरल एस.एम. उरूज अतहर विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। गुजरात के केपी समूह के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. फारूक जी. पटेल विशेष अतिथि रहे। मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने सर सैयद के संघर्ष और दृढ़ संकल्प की तुलना आज के युवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों से करते हुए विद्यार्थियों से कहा कि उन्हें केवल सफलता हासिल करना ही नहीं, बल्कि असफलताओं का सामना करना भी सीखना चाहिए। उन्होंने सर सैयद के शैक्षिक आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने विरोध को अवसर में बदला। साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प के साथ सामना करने पर असफलताएं भी उपलब्धि की सीढ़ियां बन सकती हैं। न्यायमूर्ति मसीह ने पढ़ने, वैज्ञानिक खोज, तर्कशीलता और खुले विचारों के प्रति सर सैयद की प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए कहा कि जो समुदाय पढ़ता और सोचता नहीं, वह प्रगति नहीं कर सकता। उन्होंने विद्यार्थियों को डिजिटल सामग्री पर सतही निर्भरता के बजाय गंभीरता से पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि पुस्तकें ज्ञान बढ़ाती हैं, अभिव्यक्ति को बेहतर बनाती हैं और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करती हैं। उन्होंने सर सैयद की सांप्रदायिक सद्भाव की सोच का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका विश्वास था कि हिंदू और मुसलमानों का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। एएमयू का विविधतापूर्ण परिसर इस सोच का जीवंत उदाहरण है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों के लोग साथ पढ़ते, सीखते और आगे बढ़ते हैं।

अवसरों का निर्माण का आह्वान
एएमयू से अपने जुड़ाव को याद करते हुए न्यायमूर्ति मसीह ने कहा कि विश्वविद्यालय ने उन्हें कक्षा से बाहर भी सम्मान, संवाद, मित्रता और जिम्मेदारी के महत्वपूर्ण सबक सिखाए। उन्होंने विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति प्रो. नइमा खातून की सर सैयद की सोच को उद्देश्य और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ाने के लिए सराहना की। उन्होंने विद्यार्थियों से व्यक्तिगत उपलब्धियों से आगे सोचने और आने वाली पीढ़ियों के लिए अवसरों का निर्माण करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यही सर सैयद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।





